कोरोना वायरस महामारी और देश में आर्थिक संकट, मेहनतकस मजदूरों की अनदेखी |


कोरोना वायरस महामारी का संक्रमण भारत में लगभग 30000 को पार कर चुका है और लॉक डाउन के 36 दिन पूरे हो चुके हैं परंतु अभी हमे नहीं मालूम है की कब तक ये चलने वाला है | लोगो की परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है कुछ खबरों के मुताबिक 14 करोड़ से अधिक लोग अपनी नौकरी खो चुके हैं| और आने वाले समय में छोटे और मझोले उद्योग अपने आप को कैसे पुनर्जीवित कर पायेंगे ये अपने आप में बहुत बढ़ा प्र्शंचिंह है और और बहुत बड़ी आबादी इन छोटे उद्योगों में काम करती है और अपना जीवन यापन करती है|


महामारी के बाद का संकट बहुत ही भयाभय मालूम पड़ता है क्योंकि तब सबसे बढ़ी चुनोती देश की आर्थिक स्थति को पटरी पर लाना होगा जिन लोगों के रोजगार चले गए हैं उनको कैसे रोजगार मिलेगा और पूरा सिस्टम जो लॉक डाउन के बजह से तहस नहस हो गया है उसको पटरी पर लाना सरकार की बड़ी जिम्मेदारी होगी देखना ये होगा की सरकार अपनी इस परीक्षा में कैसे सफल होती है क्योंकि सरकार की कार्य प्रणाली हमेशा से शक के घेरे में रही है की वो बड़े उद्योगों को तो राहत पैकज दे देती है परन्तु छोटे व मझोले उद्योगों के लिए लिए कोई खास नीति नहीं होती है | हमारा मानना ये है की सभी छोटे बड़े कर्मचारियों की आर्थिक स्थति चरमरा गयी है उनके लिए भी सरकार कुछ नीति बनाये ताकि उनको भी राहत मिल सके |


भूख से बिलखते लोगों से दस्तावेज की मांग बड़ी शर्मनाक और दुखद लगती है और ये मानवीय भी नहीं लगती | सरकार के नीति निर्धारक किस सोच से नीति बनाते है पता नहीं जब पूरा देश महामारी के संकट से झूझ रहा है ऐसे में सरकार को चाहिए की सभी को एक तरफ से भोजन तो सुनिश्चित करे और भूके से किसी प्रकार का दस्तावेज मांगना बेहद असंवेदनशील है अमानविए है | सरकार द्वारा बांटे जा रहे राशन में एक और कमी है जिस समय सब कुछ बंद है ऐसे समय में सरकार लोगों को गेहूं बाँट रही है ऐसे बे जिनको भूख हो गेहूं को कहाँ पर पीसेंगे | और देश में भोजन का अधिकार मौलिक अधिकार होते हुये भी लोग भूख से तड़प कर मर रहे है ये देश पर बहुत बड़ा कलंक है हमारे देश के नीति निर्माताओं को इस बात का विशेष ध्यान होना चाहिए की देश में कैसी भी विपति क्यों न हो परन्तु कोई भूखा न मरे | परन्तु आये दिन कोई न कोई खबर सुनने को मिल ही जाती है |

गलत नीति के चलते सरकार ने बहुत बड़ी संख्या में मजदूरों को भिखारी बना दिया अब वे भिखारी की तरह से खाने की लाइन लगकर घंटों इन्तजार करके अपने भूक मिटा रहे है बहुत से ऐसे भी है जिनको भोजन ऐसे भी नहीं मिलता है क्योंकि भोजन के पाकेट की संख्या सीमित होती है जो लाइन में पहले लग गया उसको मिल गया जो रह गया सो रह गया|


सरकार को चाहिए की इस विपदा में सभी को एक तरफ से राशन वितरित करे बिना कोई कागज का टुकड़ा देखे | सरकार से अच्छा तो स्वंम सेवी संस्थाए कर रही है उनको मालूम है की एक इंसान की क्या जरूरत है उनको क्या चहिये वे राशन किट में हर जरूरत का सामान मुहिया करा रहे है परन्तु मुस्किल ये है की उनके पास सीमित संसाधन होते है उनकी अपनी सीमायें होती है| सरकार को संस्थायों से सीख लेते हुये महामारी के समय में अपनी राशन वितरण प्रणाली में सुधार करना चाहिए |



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मेहनतकस मजदूर किसी भी देश की रीड की हड्डी होती है | देश की आर्थिक प्रगति में मजदूरों का विशेष योगदान होता है | परन्तु ये भी बिडम्बना है की पूंजीवाद में मजदूरों को सिर्फ मजदूर या मशीन समझा जाता है देश में उनको नागरिक की हैसियत से नहीं देखा जाता यदि देखा जाता तो उनके अधिकारों उनके दुःख परेशानी की चिंता सरकार की नीति में झलकती | परन्तु उनके साथ भेदभवपूर्ण व्यवहार किया जाता है देश व राज्य सरकारों ने इस महामारी के संकट में मजदूरों को ध्यान रखकर कोई योजना नहीं बनायीं की इनके रोजगार का क्या होगा ये अपना पेट कैसे भरेंगे कैसे ये मकान का किराया व अन्य जरूरतों को कैसे पूरा करेंगे सरकार अचानक एक आदेश लाती है और सब कुछ उलट पलट हो जाता है | मजदूरों को नौकरी से निकल दिया जाता है उनकी तन्ख्हा नहीं दी जाती है उनके किसी भी हित का ध्यान नहीं दिया जाता है की वे अपने परिवार के साथ है छोटे बच्चे है बीमारी है कैसे वे अपना गुजरा करेंगे | अमीर घरानों के छात्रों को देश के विभिन्न राज्यों से लाने के इंतजाम किये गए बल्कि विदेशों से भी छात्रों को सुरक्षित लाया गया इस कार्य के लिए सरकार की प्रशंशा करनी चहिए परन्तु मजदूरों के साथ भेदभाव क्यों उनको भी उनके अपने जिलों व राज्यों को वापस भजने की की व्यवस्था की गे जानी चाहिए थी | अलग अलग जगहों से बहुत दुखद खबरे आई की मजदूरों ने पैदल जाना शुरू कर दिया बहुतो की तो भूखे प्यासे पैदल चलने से मौत तक हो गयी | उत्तर प्रदेश के मजदूर जब बीएस अड्डे पर इक्कठे हो गए तो मजबूरन मुख्यमंत्री जी को आदेश करके बसों का इनजाम करना पड़ा | उसमे में भी बरेली से एक अमानविए घटना सामने आई की जब मजदूर बरेली पहुचे तो बरेली प्रशाशन ने उन मजदूरों पर कीटनाशक दवाई का छिडकाव करवाया |




सवाल ये उठता है की मजदूर सिर्फ मशीन के तरह से काम करने के लिए ही होते हैं क्या ये मनुष्य की श्रेणी में नहीं आते है और इन पर हमेशा सरकार का भेदभावपूर्ण व्यवहार क्यों मिलता है | सबसे मुख्य बात तो मुझे ये लगती है की श्रम मंत्रालय जो की मजदूरों के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए ही काम करता है वो इतना निष्क्रिये कैसे है श्रम मंत्रालय को संज्ञान लेना चाहिए था की मजदूरों को किसी प्रकार की परशानी न हो |


सफाई कर्मी योद्धयों के साथ भेदभावपूर्ण नीति महामारी के संकट दौर में शर्मनाक है देश के सफाई कर्मी बेहद निम्न सुरक्षा उपकरणों के भी इस संकट के दौर में देश के साथ कन्धा से कन्धा मिलाकर अपनी जान जोखिम में डाल कर देश को सुरक्षा प्रदान कर रहे हैं जबकि सबसे अधिक खतरा सफाई कर्मियों को ही होता है वे गंदगी को साफ़ करते है गंदगी में अधिक प्रकार के संक्रमण होते है| पहले तो इन सफाई कर्मियों को डॉक्टर व अन्य कर्मियों की भाँती सुरक्षा किट क्यों नहीं दी जाती | इनके साथ भेदभाव क्यों होता है |


"देश भर में कई सफ़ाई-सैनिक कोरोना से लड़ते हुए शहीद भी हो चुके हैं। फिर भी वे साफ़-सफ़ाई रखकर हमें कोरोना के संक्रमण से यथासंभव बचाने का प्रयास कर रहे हैं।"


हाल ही में दक्षिण दिल्ली नगर निगम के सफ़ाई सैनिक विनोद की कोरोना से मौत हो गयी। इससे पहले पूर्वी दिल्ली की सफ़ाई सैनिक दया भी कोरोना संक्रमण के कारण अपनी जान गंवा चुकी हैं। गौरतलब है कि इसी नगर निगम की कोरोना संक्रमित संगीता और सुनीता लोकनायक जय प्रकाश अस्पताल में मौत से जूझ रही हैं। सफ़ाई कर्मचारी एक्शन कमेटी के वीरेंदर सिंह का आरोप है कि विनोद की मौत के लिए निगमायुक्त ज्ञानेश भारती जिम्मेदार हैं। क्योंकि बार-बार गुहार लगाने पर भी सफ़ाई कर्मचारियों को सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं कराये जा रहे। https://hindi.newsclick.in/Why-are-our-clean-soldierr-neglected


आये दिन हमें कही से कोई खबर मिल जाती है की कहीं पर सीवर कर्मचारी की सीवर में काम करते समय मौत हो गयी | कही पर इनके साथ मार पिटाई की गयी इत्यादि |

सरकार को इन सफाई कर्मियों की सुरक्षा व सम्मान के लिए एक मजबूत नीति बनानी चाहिए ताकि समाज का ये समूह भी समाज में बराबरी व सम्मान जनक जीवन जी सके |


आरोग्य सेतु एप्प का खतरा आने वाले दिनों में हम सब पर है न जाने सरकार ने कैसे सोच लिया की स्मार्ट फ़ोन सभी के पास हैं है और सरकार यात्रा के दौरान इस एप्प को अनिवार्य करने की सोच बना रही है मीडिया की खबरों से पता चलता है की सरकार मेट्रो और हवाई यात्रा के दौरान इस एप्प को अनिवार्य करने जा रही है यदि ये सुचना सही है तो सच में ये एक बड़ा खतरा है इससे काफी लोगो की यात्रा पर प्रभाव पड़ने की आशंका है | सरकार को इस निर्णय के बारे में विचार करने की अवयस्कता है | और इस एप्प पर भी निजता के सवालों चर्चा शुरू हो गयी है की ये कैसे काम करता है है इस एप्प के जरिये किसी भी व्यक्ति पर आसानी से निगरानी रखी जा सकती है अंत में टेक्नोलॉजी है शक तो बनता ही है क्योकि इन्टरनेट से इस्तेमाल होने वाली किसी भी सेवा को सुरक्षित नहीं माना जा सकता है |

नोट: लेखक के निजी विचार हैं

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