भोजन का अधिकार (Right to Food) और कोरोना संकट में मजदूरों की असहनीय भूख।

सुप्रीम कोर्ट ने 2001 में भोजन के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी व्याख्या में कहा कि भोजन का अधिकार भारतीयों का मौलिक अधिकार है। साथ ही 2003 में इसे और स्पष्ट करते हुए कहा कि 'भूख से मुक्त होने का अधिकार मौलिक अधिकार है।

कोरोना संकट काल मे सरकार द्वारा इस परेशानी को दूर करने के लिये सराहनीय कदम उठाए जा रहे हैं। सरकार अपनी हर संभव कोशिश कर रही है की इस समय जरूरत की हर वस्तु या सेवा नागरिकों को मुहिया करा रही है। सरकार भूख से लड़ने के लिये भी कच्चा राशन व पका हुआ भोजन की व्यवस्था की है।


परन्तु इन सभी व्यवस्था के चलते भी बहुत से लोग भूख से तड़फ रहें हैं क्योंकि पका भोजन आधार कार्ड से और कच्चा राशन राशन कार्ड से ही दिया जा रहा है। जिसके चलते बहुत से लोग इस सुविधा का लाभ नही ले पा रहें हैं।


हम सुझाव के तौर पर कहना चाहते हैं कि जब तक ये संकट काल चल रहा है तब तक सरकार सारभौमिक तरीके से राशन व पका भोजन बाटे ताकि सभी इसका लाभ ले पाएं और किसी के सामने किसी प्रकार की अड़चन न आये। और कोई भी नागरिक भूखा न रह पाय। भूख के सामने कोई कागज का टुकड़ा न आये।


और सभी का भोजन प्राप्त करने का अधिकार सुरक्षित रह पाए।

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